हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, इस्लाम का इतिहास उन महान और नेक महिलाओं के ज़िक्र से रोशन है, जिन्होंने अपने ज्ञान, मज़बूती और अपने कर्मों से इंसानियत को एक नई दिशा दी। हज़रत फ़ातिमा मासूमा (सलाम-उल्लाह-अलैहा) की विलादत का यह ख़ुशी का मौक़ा हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हम उनके जीवन (सीरत) के उन रोशन पहलुओं को समझें जो आज के दौर की महिलाओं के लिए एक मुकम्मल मार्गदर्शन (गाइडेंस) हैं।
हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.अ.) की हस्ती ज्ञान, हया, समझदारी और बहादुरी का एक ख़ूबसूरत संगम है। आप ख़ानदान-ए-इस्मत-ओ-तहार त का वो चमकता हुआ मोती हैं जिन्हें 'करीमा-ए-अहले बैत' के नाम से याद किया जाता है। उनके पवित्र जीवन का सबसे ख़ास और ऐतिहासिक पहलू उनका वो महान सफ़र-ए-हिजरत है जो उन्होंने मदीना मुनव्वरा से ख़ुरासान की तरफ़ किया।
देखने में तो यह एक बहन का अपने ग़रीब-उल-ग़ुरबा भाई हज़रत इमाम रज़ा (अलैहिस्सलाम) से मुलाक़ात का सफ़र था, लेकिन असल में यह एक जागरूक महिला की तरफ़ से शुरू किया गया एक बड़ा दीनी और राजनैतिक (सियासी) आंदोलन था। जब अब्बासी ख़लीफ़ा मामून ने इमाम रज़ा (अ.स.) को ज़बरदस्ती मदीना से ख़ुरासान बुलवाया तो दीन और इमामत के मक़सदों को बहुत ख़तरा था। ऐसे में बीबी मासूमा (स.अ.) ने मदीने के शांत माहौल को छोड़कर एक मुश्किल और लंबे सफ़र की शुरुआत की। इस सफ़र का असली मक़सद सिर्फ़ पारिवारिक प्यार नहीं था, बल्कि वक़्त के इमाम की मदद करना, विलायत की रक्षा करना, और उस वक़्त की ज़ालिम हुकूमत के बुरे इरादों को बेनक़ाब करते हुए हक़ की आवाज़ बुलंद करना था।
बीबी मासूमा (स.अ.) ने अपने इस हिम्मत भरे क़दम से पूरे मानव इतिहास और ख़ास तौर पर महिलाओं को यह पैग़ाम दिया कि जब दीन को बचाने का मसला हो और समाज में ज़ुल्म बढ़ रहा हो, तो एक ईमान वाली औरत ख़ासमोश तमाशाई बनकर नहीं रहती। वो हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) और हज़रत ज़ैनब (स.अ.) की सुन्नत पर अमल करते हुए समाज के सुधार, जागरूकता और हक़ की रक्षा के लिए पूरी मज़बूती के साथ मैदान-ए-अमल में उतरती है। उनके इसी सफ़र और शहर-ए-क़ुम में रुकने ने इस शहर को ऐसा बड़ा इल्मी और रूहानी केंद्र (मरकज़) बना दिया जो आज तक पूरी दुनिया को ज्ञान और समझ की रोशनी बांट रहा है।
आज के दौर की महिलाओं के लिए इस सफ़र-ए-हिजरत में एक बहुत बड़ी और व्यावहारिक (अमली) सीख छिपी है। आज के ज़माने में जब वैचारिक और सांस्कृतिक हमले चरम पर हैं, पश्चिमी संस्कृति के बुरे असर और सोशल मीडिया की चकाचौंध हमारी पारिवारिक व्यवस्था (ख़ानदानी निज़ाम) को खोखला कर रही है, ऐसे में औरत की सामाजिक और दीनी ज़िम्मेदारियां कई गुना बढ़ गई हैं। आज की मुसलमान खातून को बीबी मासूमा (स.अ.) की सीरत से प्रेरणा लेते हुए अपने दीन, पारिवारिक मूल्यों और हिजाब की पूरी तरह से रक्षा करनी है।
आज के दौर की औरत को चाहिए कि वो ख़ुद को आधुनिक शिक्षा और शुद्ध दीनी तालीम से संवारे। एक पढ़ी-लिखी और समझदार मां, बहन या बेटी के रूप में वो ऐसी पीढ़ी (नस्ल) तैयार कर सकती है जो आज के दौर की बुराइयों और भटकाव का डटकर मुक़ाबला कर सके। आज के समाज को ऐसी हिम्मत वाली और नेक महिलाओं की ज़रूरत है जो स्कूल-कॉलेज, काम की जगहों और सोशल मीडिया के नए प्लैटफ़ॉर्म्स पर हक़ की मज़बूत आवाज़ बनें और ग़लत बातों का तर्कों (दलीलों) के साथ जवाब दें।
बीबी मासूमा (स.अ.) का यह पवित्र सफ़र हमें यह सिखाता है कि औरत की पाकीज़गी और हया उसके सामाजिक, शैक्षणिक और दीनी कामों में बिल्कुल भी रुकावट नहीं है, बल्कि यह उसकी सबसे बड़ी ताक़त और सम्मान है। ज़रूरत इस बात की है कि आज के दौर की खातून इस बेहतरीन मिसाल (उस्वा-ए-हसना) को अपनी ज़िंदगी का केंद्र बनाए, ताकि वो न सिर्फ़ अपनी दुनिया और आख़िरत संवार सके बल्कि अपने समाज, परिवार और दीन की एक सच्ची और जागरूक रक्षक भी बन सके।
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